परीक्षा व्यवस्था का पतन और युवाओं का भविष्य: जवाबदेही से भागती भाजपा सरकार

कांग्रेस ने शिक्षा को अधिकार बनाया, भाजपा ने शिक्षा को कारोबार और पेपर लीक का शिकार बनाया
2014 से 2026 : शिक्षा और युवाओं पर भाजपा सरकार का रिपोर्ट कार्ड

लेखक : विजय शंकर नायक
प्रदेश प्रवक्ता, झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमिटी

“किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और युवाओं के सपनों में बसता है।”
लेकिन आज भारत का युवा अपने उन्हीं सपनों को बिखरते हुए देख रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों खपाने वाले लाखों छात्र आज ऐसे तंत्र के सामने खड़े हैं, जहां मेहनत, प्रतिभा और ईमानदारी से अधिक महत्व पेपर माफियाओं, भ्रष्ट नेटवर्क और सरकारी विफलताओं का हो गया है। यह संकट किसी एक परीक्षा, एक विभाग या एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है; यह पूरे देश की शिक्षा और भर्ती व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा है।
पिछले बारह वर्षों में भाजपा सरकार ने “न्यू इंडिया”, “अमृतकाल” और “विश्वगुरु” जैसे आकर्षक नारे दिए। मगर जब देश का युवा रोजगार, निष्पक्ष परीक्षा और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया की मांग करता है, तो उसे केवल आश्वासन, जांच समितियां और बार-बार बदलती परीक्षा तिथियां मिलती हैं। यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है—नारों में विकास, ज़मीन पर निराशा।
साल 2014 से 2024 के बीच देश में लगभग 89 पेपर लीक के मामले सामने आए और 48 बार परीक्षाएं दोबारा आयोजित करनी पड़ीं। वर्ष 2026 में भी यह सिलसिला थमा नहीं है। NEET, NET, पुलिस भर्ती, शिक्षक नियुक्ति, रेलवे और विभिन्न राज्य स्तरीय परीक्षाओं में सामने आए घोटालों ने युवाओं का भरोसा हिला दिया है।
करोड़ों परिवार अपने बच्चों की शिक्षा पर अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं। कई माता-पिता कर्ज लेकर कोचिंग फीस भरते हैं। छात्र वर्षों तक घर-परिवार से दूर रहकर तैयारी करते हैं। लेकिन जब परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र बाजार में बिकने लगते हैं, तब केवल परीक्षा नहीं टूटती—करोड़ों सपनों का भविष्य भी बिखर जाता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि देश की सबसे प्रतिष्ठित और संवेदनशील परीक्षाओं में भी पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं। चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश का प्रमुख माध्यम बन चुकी NEET परीक्षा लगातार विवादों में रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, अनिश्चितता और लगातार बदलती परिस्थितियां हजारों छात्रों को मानसिक तनाव और अवसाद की ओर धकेल रही हैं। यह अब केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक संकट बन चुका है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता Rahul Gandhi लगातार इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना रहे हैं। उनका कहना है कि यह केवल पेपर लीक का मामला नहीं, बल्कि उन संस्थाओं के व्यवस्थित क्षरण का परिणाम है जो देश की परीक्षाओं और भर्ती प्रक्रियाओं का संचालन करती हैं। जब योग्यता और निष्पक्षता की जगह
राजनीतिक निष्ठा को महत्व दिया जाता है, तब संस्थाओं की विश्वसनीयता स्वतः समाप्त होने लगती है।
भाजपा सरकार की सबसे बड़ी विफलताओं में एक यह रही कि हर बड़े घोटाले के बाद पहले इनकार किया गया, फिर जनदबाव बढ़ने पर सीमित कार्रवाई का दिखावा किया गया। पेपर लीक मामलों में अक्सर छोटे स्तर के लोगों की गिरफ्तारी होती है, लेकिन उन बड़े नेटवर्कों तक जांच शायद ही पहुंचती है जो इस पूरे काले कारोबार को संचालित करते हैं। इससे यह संदेह गहराता है कि कहीं न कहीं सत्ता का संरक्षण इन माफियाओं को प्राप्त है।
यह स्थिति इसलिए भी अधिक चिंताजनक है क्योंकि देश पहले से ही बेरोजगारी की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। लाखों सरकारी पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। भर्ती प्रक्रियाएं या तो शुरू नहीं होतीं, या फिर अदालतों और घोटालों में फंस जाती हैं। ऐसे में यदि परीक्षा प्रणाली भी अविश्वसनीय हो जाए, तो युवाओं में निराशा और आक्रोश स्वाभाविक है।
इसके विपरीत कांग्रेस का दृष्टिकोण हमेशा स्पष्ट रहा है—शिक्षा कोई वस्तु नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त अधिकार है। यूपीए सरकार के कार्यकाल में शिक्षा को सामाजिक न्याय और समान अवसर के सबसे प्रभावी उपकरण के रूप में देखा गया। शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) ने पहली बार देश के बच्चों को शिक्षा का कानूनी अधिकार दिया। सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, छात्रवृत्ति योजनाएं और मध्याह्न भोजन योजना के विस्तार ने लाखों गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ा।
इसी अवधि में नए IIT, IIM, NIT, केंद्रीय विश्वविद्यालय और AIIMS की स्थापना या स्वीकृति दी गई। उद्देश्य स्पष्ट था—उच्च शिक्षा तक पहुंच को समाज के हर वर्ग के लिए खोलना। कांग्रेस ने शिक्षा को सामाजिक सशक्तिकरण और राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना।
दूसरी ओर भाजपा शासनकाल में शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण तेजी से बढ़ा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में कई सकारात्मक बातें अवश्य हैं, लेकिन नीति की सफलता केवल दस्तावेजों से नहीं, बल्कि संसाधनों और राजनीतिक इच्छाशक्ति से तय होती है। नीति स्वयं शिक्षा पर GDP का 6 प्रतिशत सार्वजनिक निवेश करने की बात करती है, लेकिन यह लक्ष्य अब भी अधूरा है। सार्वजनिक निवेश की कमी के कारण सरकारी विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को आवश्यक संसाधन नहीं मिल पा रहे।
आज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा लगातार महंगी होती जा रही है। गरीब, किसान, मजदूर, दलित, आदिवासी और मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच पहले से अधिक कठिन हो गई है। यदि शिक्षा अवसर के बजाय आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो जाए, तो सामाजिक न्याय की अवधारणा कमजोर पड़ जाएगी।
कांग्रेस का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए केवल भाषण नहीं, बल्कि ठोस सुधारों की आवश्यकता है।
पहला—पेपर लीक और भर्ती घोटालों की निष्पक्ष जांच हो।
दूसरा—सर्वोच्च न्यायिक निगरानी या JPC के माध्यम से जवाबदेही तय हो।
तीसरा—परीक्षा सुरक्षा के लिए स्वतंत्र और आधुनिक राष्ट्रीय तंत्र बने।
चौथा—शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश GDP के 6 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए।
पांचवां—रिक्त शिक्षक पदों और सरकारी नौकरियों में समयबद्ध नियुक्तियां सुनिश्चित हों।
साथ ही, पेपर लीक को संगठित अपराध की श्रेणी में लाकर दोषियों पर कठोर दंड लागू किया जाना चाहिए। जिन छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है, उन्हें मानसिक और आर्थिक सहायता भी मिलनी चाहिए। सरकार का दायित्व केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं, बल्कि छात्रों के विश्वास की रक्षा करना भी है।
आज भारत का युवा किसी विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहा। वह केवल निष्पक्ष अवसर, पारदर्शी परीक्षा प्रणाली और अपनी मेहनत का सम्मान चाहता है। लेकिन जब बार-बार पेपर लीक होते हैं, भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक लटकती हैं और सरकार जवाबदेही से बचती है, तब युवाओं का विश्वास टूटना स्वाभाविक है।
भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में से एक है। यदि यही युवा व्यवस्था से निराश हो गया, तो इसका प्रभाव केवल रोजगार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की सामाजिक और आर्थिक प्रगति पर भी पड़ेगा। इसलिए शिक्षा और रोजगार का प्रश्न केवल राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय है।
आज समय की मांग है कि शिक्षा को बाजार नहीं, अधिकार माना जाए; परीक्षा को कारोबार नहीं, प्रतिभा की कसौटी बनाया जाए; और युवाओं को आंकड़ों का हिस्सा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का भागीदार समझा जाए।
कांग्रेस ने शिक्षा को अधिकार बनाकर करोड़ों गरीब बच्चों के लिए अवसरों के दरवाजे खोले थे। आज आवश्यकता है कि उसी भावना को फिर से मजबूत किया जाए। क्योंकि मजबूत भारत की नींव मजबूत शिक्षा व्यवस्था और युवाओं के सुरक्षित भविष्य पर ही टिक सकती है।
देश का युवा पूछ रहा है—
“मेहनत मेरी, सपने मेरे, संघर्ष मेरा… तो फिर बार-बार सजा मुझे ही क्यों?”
इस सवाल का जवाब सरकार को देना ही होगा। क्योंकि युवाओं के भविष्य की रक्षा करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का सबसे बड़ा दायित्व है, और उससे भागना इतिहास कभी माफ नहीं करता।
आज सवाल केवल पेपर लीक का नहीं है—सवाल भारत के भविष्य का है

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